भोपाल गैस त्रासदी,ज़हरीले कचरे के ढ़ेर पर बैठा है झीलों का शहर !

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भोपाल | भोपाल गैस त्रासदी के 34 वर्ष हो चुके है,यह वो दिन है जब लोग खून की उल्टियां, दम फूलने, कैंसर, लकवा जैसी बीमारियों से काल के ग्रास बन गए, यूं तो राजधानी भोपाल का नाम देश के सबसे स्वच्छ शहर की फहरिस्त में दूसरे नंबर पर दर्ज है, लेकिन आज भी जमीन में दबा सैकड़ों मीट्रिक टन ज़हरीला कचरा शहर की फिजाओं में ज़हर घोल रहा है.

बतादें की बता दें कि 1984 में दो दिसंबर और तीन दिसंबर की रात भोपाल शहर पर कहर बनकर टूटी थी.यह हादसा दुनिया की सबसे बड़ी त्रासदियों में से एक था, जब यूनियन कार्बाइड कारखाने से एक खतरनाक ज़हरीली गैस रिसी थी, और पूरे शहर को अपनी चपेट में ले लिया था. इस मामले में सरकार ने 22,121 मामलों को मृत्यु की श्रेणी में दर्ज किया था, तो वही 3900 तो बुरी तरह प्रभावित हुए एवं पूरी तरह अपंगता के शिकार हो गये.इस दौरान 5,74,386 मामलों में तकरीबन 1,548.59 करोड़ रुपये की मुआवज़ा राशि बांटी गई .

भोपाल गैस त्रासदी को लगातार मानवीय समुदाय और उसके पर्यावास को सबसे ज़्यादा प्रभावित करने वाली औद्योगिक दुर्घटनाओं में गिना जाता रहा, इसीलिए 1993 में भोपाल की इस त्रासदी पर बनाए गये भोपाल-अंतर्राष्ट्रीय चिकित्सा आयोग को इस त्रासदी के पर्यावरण और मानव समुदाय पर होने वाले दीर्घकालिक प्रभावों को जानने का काम सौंपा गया था

झीलों के शहर भोपाल में शहर के बीचों-बीच तकरीबन 340 मीट्रिक टन हत्यारा कचरा मौजूद रहता है, यह कचरा दो तरह का है. एक वह, जो गोदाम में भरा हुआ है, और एक वह, जो कारखाने के संचालन के वक्त निकलता था. गैस पीड़ित संगठनों का दावा है कि तकरीबन 10,000 मीट्रिक टन कचरा खाली ज़मीन में दफ़न कर दिया गया,है जो धीरे -धीरे ज़मीन में पानी के साथ रिस रहा है,यदि समय रहते इसका निपटान नहीं किया गया तो आने वाले वर्षो में यह जान जीवन के लिए घातक सिद्ध हो सकता है.

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