इंदौर में बीजेपी नगर अध्यक्ष के लिए नये नामों की भरमार, किस्सा कुर्सी का!

इंदौर में बीजेपी नगर अध्यक्ष के लिए नये नामों की भरमार, किस्सा कुर्सी का!
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एंकर – भारतीय जनता पार्टी में संगठनात्मक चुनावों की सुगबुगाहट अब अपने चरम पर है, ऐसे में दीपावली के बाद बीजेपी में नामों का घमासान भी तेज़ होने के संकेत मिलने लगे हैं ।

जी, हाँ भारतीय जनता पार्टी के इंदौर नगर अध्यक्ष पद के लिए संगठन में सियासी सुगबुगाहट अब सुनाई देने लगी है । जहां एक ओर नेता-कार्यकर्ता झाबुआ उपचुनाव का शोर थमने का इंतज़ार कर रहे थे वहीं अब संगठन में नए नामों को लेकर भी चर्चाएं तेज़ हो गई हैं । पार्टी सूत्रों की मानें तो इंदौर में युवा चेहरों के साथ-साथ अनुभवी चेहरे भी इस दौड़ में शामिल हैं । कहा जा रहा है कि दीपावली के बाद ये तमाम नाम सियासी गलियारों में आमने-सामने भी होंगे । इसके साथ इंदौर नगर में ताई-भाई-भाभी या साईं में से किसकी पसंद को तरजीह दी जाएगी ये भी एक बड़ी पहेली है । ऐसे में जो नाम सबसे ज्यादा चर्चाओं में हैं उनमें पहला नाम है गौरव रणदिवे का, गौरव अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद से लेकर युवा मोर्चे की प्रदेश कार्यकारिणी का सबसे प्रबल नाम माना जाता है । यदि युवा चेहरे को तरजीह मिली तो ये नाम सबसे पहले क्रम पर नज़र आता है । इसी तरह दूसरा नाम विधायक रमेश मेंदोला के कोटे से सुमित मिश्रा का नाम भी सामने आता है, सुमित भी बेहतरीन वक्ता हैं और युवाओं के बीच खासी पकड़ के लिए भी जाने जाते हैं । इसी तरह कमल वाघेला और नानूराम कुमावत का नाम भी अनुभवी नेताओं के तौर पर बीजेपी नगर अध्यक्ष पद के लिए चर्चाओं में चल रहे हैं । देखना लाज़मी होगा कि किस तरह से बीजेपी में शुरू हुआ ये कुर्सी का किस्सा खत्म होता है और दीपावली के बाद कैसे नेताओं के बीच सियासी आतिशबाजी का क्रम तेज़ होता है ।

इसी तरह भारतीय जनता युवा मोर्चा के पूर्व नगर अध्यक्ष गोलू शुक्ला भी नगर अध्यक्ष के प्रबल दावेदार माने जा रहे हैं । बीजेपी के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष प्रभात झा की पहली पसंद भी गोलू ही माने जाते हैं ऐसे में उनकी दावेदारी से भी इनकार नहीं किया जा सकता है । जबकि वर्तमान संगठन महामंत्री मुकेश राजावत भी संगठन की पसंद के तौर पर प्रबल नामों में से एक माने जाते हैं, उन्हें बीजेपी के प्रदेश अध्यक्ष राकेश सिंह की पसंद बताया जा रहा है । बहरहाल, नामों की बीजेपी में कोई कमी नहीं है ऐसे में ये देखना दिलचस्प होगा कि कैसे किस्सा कुर्सी का किसी एक नाम पर जाकर खत्म हो पाता है।

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