जश्न -ए – राहत में जुटी महफिल, गुंजा कलंदर,कलंदर,कलंदर

जश्न -ए – राहत में जुटी महफिल, गुंजा कलंदर,कलंदर,कलंदर
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इंदौर : मशहूर शायर राहत इन्दोरी की शायरी के 50 वर्ष पूरे होने पर इंदौर के अभयप्रशाल में  निनाद व अदबी कुनबा की ओर से मुशायरा जश्न-ए-राहत कराया गया जिसमें जावेद अख्तर और कुमार विश्वास सहित देश-दुनिया के शायर व कवि शामिल हुए.  मंच पर चहलकदमी अभी बंद नहीं हुई थी। बाहर से लगातार शोर सुनाई आ रहा था। गेट पर कई लोग हाथों में वीआईपी पास लिए भी कतार में लगे थे। क्यों न लगते, पिछले दो दशक में इससे बड़ा मुशायरा इंदौर क्या मध्यप्रदेश में नहीं हुआ था। मुनव्वर राना के न आने से थोड़ी मायूसी थी, लेकिन जावेद अख़्तर और स्वानंद किरकिरे जैसे दो बड़े नामों ने फेहरिस्त गज़ब की बना दी थी।  हिदायतुल्ला  खान ने कार्यक्रम संचन से समा बांध रखा था..

स्क्रीन पर राहत साहब पर बनी फिल्म चलाई जाती है। उनका चेहरा नज़र आता है और तब अंदाज़ा होता है कि यहां जो आए हैं वो फ्री पास से जुटाई गई भीड़ नहीं है, वो दीवाने हैं राहत के…फिर शुरू हुआ राहत साहब के सम्मान का सिलसिला..फिर हुआ उस किताब का इजरा विमोचन जो राहत साहब के ज़िंदगी के वाकियात से सजी थी। किताब का उन्वान है “कलंदर’। यहां मौजूद सभी नेताओं की तरफ से सुमित्रा महाजन ही डायस पर आ गईं और आज कुछ शायराना अंदाज़ में बोलीं – “मुझे मालूम है ये मेरा मंच नहीं है, मगर मुझे इसका ज़रा भी रंज नहीं है।’ कहा – आपके साथ इंदौर का नाम पूरी दुनिया में बड़ी इज्जत से लिया जाता है। राहत साहब हमारा ग़ुरूर हैं आप।’तकरीबन पौने 10 बजे मंच पर बुलाए गए कुमार विश्वास…वही थे आज के इस मुशायरे के निज़ाम। अपनी सियासी जुमलेबाज़ी से उन्होंने माहौल बनाया। बोले – इंदौर, दुनिया आप पर फख्र करेगी, हाथ चूमेगी, सजदे करेगी क्योंकि आपने राहत इंदौरी को देखा है, उन्हें रूबरू सुना है।

देश-दुनिया में इंदौर का नाम रोशन करने वाले शायर के सम्मान के लिए आयोजकों का शुक्रिया तो अदा किया ही जाना चाहिए। इस सम्मान के लिए उन्होंने न केवल सुमित्रा महाजन, सज्जन सिंह वर्मा, तुलसीराम सिलावट, जीतू पटवारी, रमेश मेंदोला जैसे नेताओं को बुलावा भेजा बल्कि जावेद अख्तर, सत्यनारायण सत्तन, स्वानंद किरकिरे, ताहिर फराज, अजहर इनायती समेत देश के कई नामवर कलमकारों और डीएचएल कम्पनी के एमडी संतोष सिंह को भी शामिल किया। दरअसल, मुशायरे की इस महफिल का इंतजार उम्दा शेर-ओ-शायरी के शौकीन और खासतौर पर राहत इंदौरी के मुरीद एक मुद्दत से कर रहे थे। फिर वो घडी आ ही गई जब राहत साहब ने अपने शौकीनों की हर एक मुराद पूरी की.

आला दर्जे की शायरी के शौकीनों के शहर में यूं तो उम्दा कलामों और शेरों की महफिलें अक्सर सजती रहती हैं मगर इनमें से कुछ ही ऐसी होती हैं जो सामिईन की यादों की पोटली में हमेशा के लिए महफूज हो जाती हैं। बेशक ‘जश्न-ए-राहत” का भी शुमार ऐसी महफिलों में होगा लेकिन ये भी मानना पड़ेगा कि अदब के लिहाज से बुधवार रात सजी महफिल का दूसरा हिस्सा पहले के मुकाबले कहीं ज्यादा ज्यादा पुरअसर रहा। बहरहाल राहत साहब को दिली मुबारकबाद कि उनकी कलम 50 साल पूरे कर अब सुनहरी हो चली है। ..

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