बैलगाड़ी को खींचने को मजबूर हैं ये मजदूर, झकझोंर देगी आपको इनकी कहानी !

बैलगाड़ी को खींचने को मजबूर हैं ये मजदूर, झकझोंर देगी आपको इनकी कहानी !
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उज्जैन –  कोरोना महामारी के कारण देशभर में लगाए गए सख्त लॉकडाउन की मार सबसे अधिक समाज के गरीब एवं पिछड़े वर्ग पर पड़ी। लाखों की संख्या में मजदूर इस तपती दोपहरी में नंगे पांव सड़को पर चलते दिखाई दिए। कोई साइकिल से तो कोई पैदल ही सैकड़ों, हजारों किलोमीटर दूर अपने घरों के लिए निकल पड़ा।

नेशनल हाइवे पर लाखों की संख्या में चल रहे मजदूरो एवं छात्रों के दृश्य ने 70 साल पूराने बंटवारे के उस दृश्य को ताजा कर दिया जब बड़ी संख्या में लोग ऐसे ही एक स्थान से दूसरे स्थान जाने के लिए विवश हुए थे। कुछ ऐसा ही मामला उज्जैन के सांवेर से आया है। दरअसल बुधवार को सांवेर क्षिप्रा मार्ग पर हतुनिया के समीप एक मजदूर का परिवार बैलगाड़ी के साथ जा रहा था। हालांकि इस बैलगाड़ी को बैलों की जगह दो मजदूर भाई खींच रहे थे।

इस परिवार से जब इसका कारण पूछा गया तो इसका जवाब दिल को काफी झकझोर देने वाला था। बड़ा भाई सुनील ने बताया की उसके दो भाई बहन की किडनी ख़राब हो गई थी । उसके बाद उसने उनका बहुत इलाज करवाया लेकिन वह बच नहीं सके। उसके बाद उसने अपने दोनों बैलों को 18 हजार में बेच दिया और भाई बहन का अंतिम संस्कार किया। अब उसके पास कोई बैल नहीं है लिहाजा बैलगाड़ी में बैलों की जगह दोनों भाई ही कंधे लगाकर बैलगाड़ी को चला रहे हैं।

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