जब संघ और अटलजी के रिश्ते उलझ गए थे

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मध्य प्रदेश.मैं एक दिन प्रधानमंत्री नहीं रहुंगा लेकिन संघ का स्वयंसेवक आखिरी सास तक रहूंगा. उसी आरएसएस और वाजपेई के बीच एक वक्त ऐसा भी आया था जब रिश्ते बहुत उलझ गए थे.वह देश के  उदारवादी नेता और समावेशी राजनीति के पुरोधा थे. विरोधी उन्हें सही आदमी लेकिन गलत पार्टी में बताकर उनका गुणगान कर रहे थे और इधर संघ के साथ खास तौर पर उस वक्त जब सरसंघचालक के एस सुदर्शन से  उनकी दूरियां बढ़ती जा रही थीं.

वाजपेई प्रधानमंत्री रहते हुए बाबरी मस्जिद या गोधरा को लेकर उनके विचार तो खुली किताब की तरह सबके सामने थे. वहीं वे कश्मीर की जनता के दिलों में राज करने लगे थे. लेकिन संघ में एक वर्ग उनके खिलाफ हो चला था. उनकी आर्थिक नीतियां विदेशी मामलों का विरोध हो रहा था.

संघ प्रमुख सुदर्शन ने खुलकर एक इंटरव्यू में कहा कि संघ के पहले स्वयंसेवक वाजपेई की सरकार बहुत कुछ अच्छा कर सकती थी, लेकिन वह इसमे नाकामयाब रही. राम मंदिर निर्माण का रास्ता नहीं बन पाने से सुदर्शन नाराज थे.  उन्होंने साफ आरोप लगाया था कि मिश्रा की निष्ठा संदेहास्पद है. वे भाजपा के साथ ही कांग्रेस से मिले हुए हैं ऐसा उनका आरोप था.

संघ प्रमुख के इन खुले हमलों से निपटना भाजपा हाईकमान के लिए भारी था. उस वक्त भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष लालकृष्ण आडवाणी और महासचिव अरूण जेटली थे . भाजपा हाईकमान ने तत्काल एक मीटिंग की और प्रेस स्टेटमेंट जारी किया कि अटल और आडवाणी के नेतृत्व में पार्टी को पूरा विश्वास है. अटलजी की कुल छह साल की सरकार में विकास और स्थिरता के साथ देश आगे बढ़ा जैसा की सबको देखने में आया.

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