Indore: भागीरथपुरा दूषित जल कांड पर किशोर कोडवानी का हमला, बता दिया ये बड़ा सच

इंदौर में एक बार फिर दूषित पानी ने जान ले ली, लेकिन सवाल वही पुराने हैं और जवाब आज भी अधूरे। भागीरथपुरा दूषित जल कांड को लेकर शहर के जागरूक नागरिक और विकास मित्र किशोर कोडवानी ने प्रशासनिक व्यवस्था पर तीखा प्रहार किया है। उन्होंने कहा कि, 53 वर्षो से पानी-सिवरेज की योजनाएँ “गयी भैस पानी में, और इसका खामियाजा आम जनता अपनी जान देकर चुका रही है।
किशोर कोडवानी ने इंदौर के जल इतिहास को याद दिलाते हुए कहा कि 70 के दशक में इंदौर की जनता यशवंत सागर, बिलावली तालाब के 40 एमएलडी पानी और 1400 कुएं–बावड़ियों से अपनी प्यास बुझाती थी। उस दौर में पानी तीसरी मंजिल तक पहुंचता था। उन्होंने बताया कि 1972 में पानी की मांग को लेकर नर्मदा आंदोलन हुआ था, लेकिन आज स्थिति यह है कि पानी ऊपर नहीं, बल्कि 3 से 12 फीट नीचे गड्ढों में जमा हो रहा है। यानी विकास के दावों के बीच ज़मीनी हकीकत और भी भयावह होती जा रही है। इंदौर में एक खतरनाक पैटर्न बन चुका है हादसा होता है, हल्ला मचता है, जांच बैठती है, मुआवजा बंटता है और फिर फाइलें ठंडे बस्ते में चली जाती हैं। स्नेहनगर बावड़ी कांड का जिक्र करते हुए कहा कि 36 मौतों के बाद जांच और मुआवजा देकर शहर को शांत कर दिया गया, लेकिन व्यवस्था नहीं सुधरी।
नव वर्ष की शुरुआत में भागीरथपुरा में 16 मौतें हुईं, और कहानी फिर वही दोहराई जा रही है न ठोस चर्चा, न स्थायी समाधान, सिर्फ नई-नई कहानियां। उन्होंने कहा कि चेतावनियां वर्षों से दी जा रही हैं, लेकिन प्रशासन ने आंखें मूंद रखी हैं। प्रदेश में सिर्फ एक लैब साइंटिस्ट , प्रदेश में पिछले दो दशकों से नगर निगमों में लैब साइंटिस्ट की नियुक्ति नहीं हुई है।
जल शुद्धिकरण व्यवस्था पर सवाल उठाते हुए उन्होंने कहा कि, जलूद से बिजलपुर कंट्रोल रूम तक पानी पहुंचने में 2 में से सिर्फ 1 पीपीएम क्लोरीन बचता है। इसके बाद दोबारा क्लोरीन मिलाने की कोई व्यवस्था नहीं है। भागीरथपुरा दूषित जल कांड ने सिर्फ एक हादसे की कहानी नहीं बताई, बल्कि वर्षों से चल रही प्रशासनिक लापरवाही और सिस्टम फेल होने की पूरी तस्वीर सामने रख दी है। अब सवाल यही है क्या अगली मौत के बाद फिर जांच, मुआवजा और खामोशी का सिलसिला चलेगा, या इस बार व्यवस्था को सच में जवाबदेह बनाया जाएगा?



